
विनीत कुमार सिंह.
साल 2025 विनीत कुमार सिंह के करियर के लिए मील का पत्थर बनकर आया है. लगभग बीस वर्षों तक फिल्मों और सेटों के साये में कड़ी मेहनत करने के बाद, इस अभिनेता को आखिरकार वह पहचान मिल गई जिसके वह हकदार थे। ‘छावा’ और ‘सुपरबॉयज ऑफ मालेगांव’ में उनके दमदार अभिनय ने न सिर्फ उन्हें बॉक्स ऑफिस पर मजबूती दी बल्कि आलोचकों की नजरों में भी उन्हें खास जगह दिलाई। हाल ही में एक बातचीत के दौरान विनीत ने अपनी लंबी और कठिन यात्रा को याद किया और उन दिनों की झलक दी जब अभिनय एक सपना था और जीवन अस्तित्व की लड़ाई थी।
विनीत कुमार ईशान खट्टर को गोद में उठाकर ले जाते थे
युवा के ऑल-स्टार राउंडटेबल में शामिल होकर विनीत ने एक दिलचस्प किस्सा साझा किया। उन्होंने बताया कि वह 2004 में आई फिल्म ‘वाह लाइफ हो तो ऐसी’ में असिस्टेंट डायरेक्टर के तौर पर काम कर रहे थे। उसी फिल्म में आज के स्टार ईशान खट्टर बाल कलाकार थे. विनीत ने मुस्कुराते हुए कहा कि उस वक्त वह ईशान को गोद में उठाकर सेट पर लाते थे। उन्होंने स्पष्ट रूप से स्वीकार किया कि उनका सपना हमेशा से अभिनेता बनने का था, लेकिन हालात ऐसे नहीं थे कि वह तुरंत उस रास्ते पर चल सकें। उस समय उनके लिए सबसे महत्वपूर्ण बात जीवित रहना और जीवित रहना था। उनका मानना है कि अगर आप हालात से हार गए तो आपकी कहानी वहीं खत्म हो जाती है.
विनीत को ऐसे काम करने पड़े
अपने संघर्ष के दिनों को याद करते हुए विनीत ने कहा कि उन्हें कई ऐसे काम करने पड़े, जिनके बारे में आमतौर पर कोई बात नहीं करता। कभी उन्होंने सुनील शेट्टी के बॉडी डबल के तौर पर काम किया तो कभी संजय दत्त के लिए एक सीन में डेड बॉडी बन गए। विनीत के लिए ये सब अपमान नहीं, बल्कि यात्रा का एक हिस्सा था. उनका एक ही मंत्र था, अपने अंदर की आग को बुझने मत दो और आगे बढ़ते रहो। विनीत कुमार सिंह ने अपने अभिनय करियर की शुरुआत 2002 में संजय दत्त की फिल्म पिटाह से की, जिसमें उन्हें एक छोटी सी भूमिका मिली। इसके बाद वह कई सालों तक फिल्मों में छोटे-छोटे किरदार निभाते रहे। 2012 में, अनुराग कश्यप की प्रतिष्ठित फिल्म ‘गैंग्स ऑफ वासेपुर’ में उनकी सहायक भूमिका ने उन्हें कुछ पहचान दिलाई। इसके बाद ‘मुक्काबाज’ (2018) में लीड रोल ने साबित कर दिया कि वह एक्टिंग में किसी से कम नहीं हैं।
इसी फिल्म से की थी करियर की शुरुआत
विनीत कुमार सिंह ने अपने अभिनय करियर की शुरुआत 2002 में संजय दत्त की फिल्म पिता से की, जिसमें उन्हें एक छोटी सी भूमिका मिली। इसके बाद वह कई सालों तक फिल्मों में छोटे-छोटे किरदार निभाते रहे। 2012 में, अनुराग कश्यप की प्रतिष्ठित फिल्म ‘गैंग्स ऑफ वासेपुर’ में उनकी सहायक भूमिका ने उन्हें कुछ पहचान दिलाई। इसके बाद ‘मुक्काबाज’ (2018) में लीड रोल ने साबित कर दिया कि वह एक्टिंग में किसी से कम नहीं हैं। ओटीटी प्लेटफॉर्म पर ‘बार्ड ऑफ ब्लड’ और ‘रंगबाज’ जैसी सीरीज ने उनकी लोकप्रियता को और बढ़ा दिया। लेकिन उन्हें असली ब्रेक 2025 में मिला, जब साल की सबसे बड़ी हिट फिल्मों में से एक ‘छावा’ में उनका कवि कलश का किरदार दर्शकों के दिलों में बस गया। हाल ही में वह ‘तेरे इश्क में’ में सपोर्टिंग रोल में भी नजर आए थे।
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