
मुगल-ए-आजम और धुरंधर
हिंदी सिनेमा के इतिहास में कुछ फिल्में ऐसी भी हैं जो सिर्फ पर्दे पर नहीं चलतीं, बल्कि समय को पार कर एक मिसाल बन जाती हैं। मुगल-ए-आजम एक ऐसी फिल्म है, जो आज भी भारतीय सिनेमा की सबसे कल्ट और भव्य फिल्मों में गिनी जाती है। के आसिफ द्वारा निर्देशित यह फिल्म सिर्फ एक प्रेम कहानी नहीं थी, बल्कि एक सिनेमाई अनुभव थी जो दर्शकों को थिएटर तक खींचने की ताकत रखती थी। प्रेम, त्याग, शक्ति और विद्रोह की यह कहानी उस समय आई जब सिनेमा लोगों के लिए जादू से कम नहीं था।
इस फिल्म ने इतिहास रच दिया था
1944 में शुरू हुई ‘मुगल-ए-आजम’ की शूटिंग 16 साल बाद 1960 में पूरी हुई। इतने लंबे समय में बनी यह फिल्म अपने साथ अनगिनत कहानियां, संघर्ष और भव्यता लेकर आई। कहा जाता है कि फिल्म के निर्माण में पैसा पानी की तरह बहाया गया था, जिसके कारण के आसिफ को आर्थिक तंगी का सामना करना पड़ा। लेकिन जब फिल्म रिलीज हुई तो उसने एक ऐसा इतिहास रच दिया जो आज भी सुनहरे अक्षरों में दर्ज है. इस फिल्म ने न सिर्फ सालों तक बॉक्स ऑफिस पर राज किया, बल्कि नेशनल अवॉर्ड समेत कई बड़े सम्मान भी जीते।
लाइन 5 किलोमीटर लंबी थी
‘मुगल-ए-आजम’ की दीवानगी इस कदर थी कि लोग टिकट लेने के लिए थिएटर के बाहर सड़क पर रात गुजारते थे। लोग घर से खाना लाते थे, सड़क पर सोते थे और सुबह सबसे पहले टिकट लेने की कोशिश करते थे। कई शहरों में तो टिकट खिड़कियों पर 5 किलोमीटर तक लंबी लाइनें लग गईं. आज के डिजिटल युग में इसकी कल्पना करना मुश्किल है, लेकिन उस दौर में सिनेमा का यही जादू था।
इन दृश्यों को इस तरह भव्य बनाया गया था
फिल्म की भव्यता आज भी मिसाल है. सलीम और अकबर के युद्ध दृश्यों के लिए 2000 ऊँट, 4000 घोड़े और लगभग 8000 सैनिकों का उपयोग किया गया था, जिनमें से कुछ भारतीय सेना से भी लिए गए थे। यहां तक कि फिल्म में दिखाई गई भगवान कृष्ण की मूर्ति भी शुद्ध सोने से बनी थी। बाद में, मुगल-ए-आज़म अपनी ब्लैक एंड व्हाइट रिलीज़ के कई वर्षों बाद 2004 में डिजिटल रूप से रंगीन रूप में पुनः रिलीज़ होने वाली पहली हिंदी फिल्म बन गई।
‘धुरंधर’ से तुलना
अगर आज के समय की बात करें तो हाल ही में रिलीज हुई फिल्म ‘धुरंधर’ को लेकर भी दर्शकों में ऐसी ही चर्चा और क्रेज देखने को मिला है. हालाँकि, प्रारूप और माध्यम बदल गए हैं। अपनी दमदार कहानी, बड़े पैमाने और दमदार अभिनय से ‘धुरंधर’ ने साबित कर दिया कि आज भी दर्शक भव्य सिनेमा देखने के लिए तैयार हैं. फर्क सिर्फ इतना है कि जहां ‘मुगल-ए-आजम’ के लिए लोग सड़कों पर सोते थे, वहीं धुरंधर के लिए एडवांस बुकिंग, सोशल मीडिया ट्रेंड और डिजिटल रिकॉर्ड बनाए जाते हैं। ‘मुगल-ए-आजम’ ने अपने समय में सिनेमा की सीमाओं को तोड़ दिया था, उसी तरह ‘धुरंधर’ आज के दौर में बड़े कैनवास और स्केल की फिल्मों की भूख को दिखाती है। दोनों फिल्में अपने-अपने समय की पहचान हैं, एक ने इतिहास रचा तो दूसरी इतिहास से प्रेरणा लेकर आगे बढ़ रही है. यही तो सिनेमा की खूबसूरती है, जो हर दौर में अपना जादू बरकरार रखती है।
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