
हम भगवान को भोजन क्यों चढ़ाते हैं?
भगवान को भोग लगाने की परंपरा: आपने बचपन से देखा होगा कि हमारे घर में खाना बनने के बाद सबसे पहले उसे घर के मंदिर में मौजूद देवी-देवताओं को अर्पित किया जाता है। यह परंपरा सदियों से चली आ रही है कि हिंदू परिवारों में हर दिन सभी के भोजन करने से पहले भगवान को भोग लगाया जाता है। लेकिन क्या आप जानते हैं कि ऐसा क्यों किया जाता है? भोजन कराने से कैसे मिलती है अन्न दोष से मुक्ति?
सनातन धर्म: हर कार्य के पीछे एक गहरा संदेश छिपा होता है। देवी-देवताओं को भोग लगाना भी इनमें से एक है, जिसका गहरा आध्यात्मिक अर्थ है। यह सिर्फ एक प्रथा या परंपरा नहीं है, बल्कि यह भक्त की कृतज्ञता, अहंकार के त्याग और आंतरिक शांति का प्रतीक है। भगवान को भोग लगाने का वास्तविक उद्देश्य साधारण भोजन को प्रसाद में बदलना और अन्न दोष से मुक्ति पाना है।
भोग का अर्थ : समर्पण और कृतज्ञता
भगवान को भोजन अर्पित करना केवल भोजन अर्पित करने की क्रिया या धार्मिक परंपरा नहीं है, बल्कि भगवान के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने का एक साधन है। यह मन, आत्मा और भोजन को शुद्ध करने का भी एक तरीका है। भगवान भोजन के भौतिक भाग को नहीं, बल्कि भक्त की ‘भावना’ को स्वीकार करते हैं। इस प्रक्रिया से मन में सेवा की भावना और अहंकार समाप्त हो जाता है।
भोजन से प्रसाद बनाने की प्रक्रिया
जब भगवान को भोजन अर्पित किया जाता है तो वह सामान्य भोजन नहीं रह जाता। मंत्रोच्चार और भगवान के दर्शन से यह ‘महाप्रसाद’ बन जाता है। भगवत गीता में भी कहा गया है कि भक्त का प्रेम और भक्ति भगवान को प्रिय है, चाहे वह पत्र हो, फूल हो, जल हो या भोजन हो। इस प्रकार भगवान को भोग लगाने से भक्त की भक्ति बढ़ती है और अन्न दोषों से मुक्ति मिलती है, जिससे खाया गया भोजन उस व्यक्ति और उसके पूरे परिवार के लिए लाभकारी और पवित्र हो जाता है।
अन्न दोष क्या है?
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार भोजन सिर्फ पेट भरने का साधन नहीं है, बल्कि इसका सीधा असर मन और जीवन पर भी पड़ता है। जब भोजन किसी प्रकार की अशुद्धता या नकारात्मकता से जुड़ा होता है तो उसे अन्न दोष कहा जाता है।
अन्न दोष कैसे उत्पन्न होते हैं?
- यदि गलत तरीकों से कमाए गए धन से भोजन बनाया जाए तो उसमें नकारात्मक ऊर्जा मानी जाती है।
- इसके अतिरिक्त यदि भोजन अस्वच्छ वातावरण में या बिना शुद्धता के बनाया गया हो तो भी दोष उत्पन्न हो सकते हैं।
- साथ ही अगर खाना बनाने वाले व्यक्ति के मन में गुस्सा, तनाव या ईर्ष्या जैसी भावना हो तो इसका असर खाने पर पड़ता है।
भोजन कराने से कैसे मिलती है अन्न दोष से मुक्ति?
जब श्रद्धा और विश्वास के साथ भगवान को भोजन अर्पित किया जाता है तो ऐसा माना जाता है कि इससे नकारात्मकता खत्म हो जाती है। भोग लगाने के बाद वही भोजन प्रसाद बन जाता है, जिससे शरीर और मन दोनों शुद्ध हो जाते हैं।
(डिस्क्लेमर: यहां दी गई जानकारी धार्मिक आस्था और लोक मान्यताओं पर आधारित है। इसका कोई वैज्ञानिक प्रमाण नहीं है। इंडिया टीवी एक भी बात की सच्चाई का प्रमाण नहीं देता है।)
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