
क्या केवल बुजुर्ग ही कल्पवास पर जा सकते हैं?
माघ मेला कल्पवास नियम: तीर्थराज प्रयाग में हर साल लगने वाला माघ मेला सिर्फ एक धार्मिक आयोजन नहीं बल्कि आत्मशुद्धि और तपस्या का महान पर्व माना जाता है। इस दौरान संगम तट पर कल्पवास की प्राचीन परंपरा का निर्वहन किया जाता है। अक्सर लोगों के मन में यह सवाल उठता है कि क्या कल्पवास सिर्फ बुजुर्गों के लिए है या युवा और गृहस्थ भी इसे कर सकते हैं। कल्पवास के नियम सख्त जरूर हैं, लेकिन उम्र के बारे में शास्त्र क्या कहते हैं, क्या सिर्फ बुजुर्ग ही कल्पवास कर सकते हैं? ये जानना जरूरी है. इस लेख में हम आपको कल्पवास के नियमों और परंपराओं के बारे में विस्तार से बता रहे हैं।
कल्पवास की परंपरा प्राचीन काल से चली आ रही है।
तीर्थराज प्रयाग में गंगा, यमुना और अदृश्य सरस्वती के संगम पर कल्पवास की परंपरा प्राचीन काल से चली आ रही है। मान्यता है कि माघ माह में यहां देवताओं का वास होता है। इसी वजह से साधु-संतों के साथ-साथ आम श्रद्धालु भी एक महीने तक संगम की रेती पर रहकर धर्म और तपस्या में लीन रहते हैं. कल्पवास को आत्मशुद्धि और मोक्ष प्राप्ति का साधन माना जाता है।
माघ मेला कब और कैसे शुरू होता है?
महा माघ मेले की धार्मिक शुरुआत पौष पूर्णिमा के पवित्र स्नान से होती है। पंचांग के अनुसार पूर्णिमा तिथि 2 जनवरी की शाम से 3 जनवरी 2026 की दोपहर तक रहेगी. उदयातिथि के आधार पर 3 जनवरी 2026 को माघ मेले की आधिकारिक शुरुआत मानी जाएगी. इस दिन से श्रद्धालु कल्पवास का संकल्प लेकर संगम तट पर निवास करना शुरू कर देते हैं।
क्या कल्पवास सिर्फ बुजुर्गों के लिए है?
आमतौर पर ऐसी धारणा है कि कल्पवास केवल बुजुर्ग ही करते हैं, लेकिन शास्त्रों में इसके लिए कोई आयु सीमा तय नहीं की गई है। कोई भी सनातनी, चाहे वह युवा हो, पुरुष हो या महिला, गृहस्थ हो या बुजुर्ग, कल्पवास का संकल्प लेकर इस धार्मिक आयोजन का हिस्सा बन सकता है। शर्त सिर्फ इतनी है कि व्यक्ति पूरी निष्ठा और अनुशासन के साथ नियमों का पालन कर सके, क्योंकि कल्पवास का जीवन बहुत कठिन और संयमित होता है।
कल्पवासियों की दिनचर्या एवं जीवन
कल्पवासी एक महीने तक बेहद सादा जीवन जीते हैं। जमीन पर सोना, चूल्हे पर बना सात्विक भोजन करना और पूरे दिन धार्मिक माहौल में रहना इसी का हिस्सा है। माघ मेले के दौरान कल्पवासी संतों के प्रवचन, भजन-कीर्तन और धार्मिक आयोजनों में बढ़-चढ़कर हिस्सा लेते हैं। संपूर्ण जीवन संयम और साधना पर आधारित है।
पुराणों में कल्पवास के 21 नियम बताए गए हैं
पुराणों में कल्पवास के 21 नियमों का उल्लेख मिलता है। इनमें सत्य बोलना, ब्रह्मचर्य का पालन करना, दिन में तीन बार गंगा में स्नान करना, तुलसी और जौ लगाना, सात्विक भोजन, सत्संग, इंद्रियों पर संयम, हिंसा और विलासिता से दूर रहना, जमीन पर सोना, भोर में जागना, मेला क्षेत्र न छोड़ना और संतों को भोजन कराना जैसे नियम शामिल हैं। कहा जाता है कि पुण्य फल प्राप्त करने के लिए कल्पवास पूरा होने के बाद भी जीवन में इन नियमों का पालन करने की सलाह दी जाती है।
पुराणों में कल्पवास के नियम
धर्म ग्रंथों में कल्पवास के 21 नियम बताए गए हैं। इसमे शामिल है:
1. झूठ न बोलना, 2. हर स्थिति में सत्य बोलना, 3. घर की चिंताओं से मुक्त रहना, 4. सुबह, दोपहर और शाम को गंगा में स्नान करना, 5. डेरे के बाहर तुलसी का पौधा लगाना और जौ बोना, 6. तुलसी और जौ को प्रतिदिन जल चढ़ाना, 7. ब्रह्मचर्य का पालन करना, 8. अपने या अपनी पत्नी के हाथ का बना सात्विक भोजन करना, 9. सत्संग में भाग लेना। लेना, 10. इंद्रियों पर नियंत्रण रखना, 11. पितरों का पिंडदान करना, 12. हिंसा से दूर रहना, 13. विलासिता से दूर रहना, 14. दूसरों की निंदा न करना, 15. जमीन पर सोना, 16. भोर में जागना, 17. किसी भी परिस्थिति में मेला क्षेत्र नहीं छोड़ना, 18. धार्मिक ग्रंथों और ग्रंथों का पाठ करना, 19. आपस में धार्मिक चर्चा करना, 20. हर दिन। साधु-संतों को भोजन कराना और दक्षिणा देना, 21. गृहस्थ आश्रम में लौटकर कल्पवास के नियम का पालन करना।
कल्पवास के चार कठोर नियम
कल्पवास के दौरान 21 नियम बताए गए हैं, लेकिन चार नियम ऐसे हैं जिनका पालन करना सख्त अनिवार्य है।
- इनमें से पहला है पवित्र नदी के तट पर एक साधारण तंबू या झोपड़ी में निवास करना।
- दूसरा दिन में तीन बार स्नान करना है, जिसमें हर दिन सूर्योदय से पहले स्नान करना शामिल है।
- तीसरा, दिन में केवल एक बार शुद्ध सात्विक भोजन करना चाहिए, जिसमें मांस, शराब, लहसुन और प्याज से परहेज करना चाहिए।
- चौथा है नियमित पूजा, ध्यान और भजन-कीर्तन के साथ संतुलित जीवन।
अनुशासन और आस्था सबसे महत्वपूर्ण है
कल्पवास का अर्थ केवल शारीरिक कष्ट सहना नहीं है, बल्कि यह मानसिक और आध्यात्मिक अनुशासन का अभ्यास भी है। इसमें झूठ, क्रोध और हिंसा से बचते हुए साधारण कपड़े पहने जाते हैं। स्पष्ट है कि कल्पवास उम्र से नहीं बल्कि आस्था, संकल्प और नियमों के पालन से सफल होता है।
(डिस्क्लेमर: यहां दी गई जानकारी धार्मिक आस्था और लोक मान्यताओं पर आधारित है। इसका कोई वैज्ञानिक प्रमाण नहीं है। इंडिया टीवी एक भी बात की सच्चाई का प्रमाण नहीं देता है।)
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