
कुछ मुक्तिजोधा थे और कुछ फैक्ट्री के मजदूर थे, उन्हें बांग्लादेश में 19 दिन के अंदर मार दिया गया।
ढाका: इस दिसंबर में बांग्लादेश में चार हिंदू नागरिकों की नृशंस हत्या ने अल्पसंख्यकों की सुरक्षा पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए। इनमें से किसी का गला काट दिया गया, किसी को पीट-पीट कर मार डाला गया और कहीं शव को सरेआम सड़क पर लटका कर डर का संदेश दिया गया. मृतकों के नाम अमृत मंडल, दीपू दास, जोगेश चंद्र रॉय और सुबर्णा रॉय शामिल हैं. अलग-अलग जगहों पर इन घटनाओं के घटित होने का तरीका अलग-अलग था, लेकिन एक बात समान थी- मृतकों की धार्मिक पहचान.
जोगेश और उसकी पत्नी की गला रेतकर हत्या कर दी गई
जानकारी के मुताबिक, जोगेश चंद्र रॉय की 7 दिसंबर को बेरहमी से हत्या कर दी गई थी. उनका गला रेतने की खबर से पूरे इलाके में दहशत फैल गई. जोगेश के साथ उनकी पत्नी सुबर्णा रॉय की भी हत्या कर दी गई. दोनों के शव बांग्लादेश के रंगपुर में घर के अंदर से बरामद किए गए. दोनों का गला रेता गया था. जोगेश चंद्र रॉय मुक्तिजोधा थे। जोगेश चंद्र रॉय 75 साल के थे और सुबर्णा रॉय 60 साल की थीं.
भीड़ ने दीपू दास की पीट-पीटकर हत्या कर दी
वहीं दीपू दास की हत्या सबसे भयावह थी. 18 दिसंबर को बांग्लादेश के मैमनसिंह में उन्मादी भीड़ ने दीपू पर ईशनिंदा का आरोप लगाया, उसे फैक्ट्री से पकड़ लिया और बाद में पीट-पीटकर मार डाला. इसके बाद उसके गले में फंदा डालकर उसके शव को सड़क पर सरेआम लटका दिया गया। फिर दंगाइयों ने उनके शरीर को जूते-चप्पलों से पीटा। आख़िरकार दंगाइयों ने इसमें आग लगा दी.
अमृत मंडल पर भीड़ का हमला
चौथा और ताजा मामला अमृत मंडल की हत्या का है. शुरुआती जानकारी के मुताबिक 24 दिसंबर की देर रात उन पर अचानक हमला हुआ और उन्हें भागने का मौका भी नहीं मिला. भीड़ ने आकर उसे बुरी तरह पीटा. बाद में उन्हें अस्पताल में भर्ती कराया गया लेकिन 25 दिसंबर की रात करीब 2 बजे इलाज के दौरान उनकी मौत हो गई। इस घटना को बांग्लादेश के राजबाड़ी में अंजाम दिया गया था।
सवाल सिर्फ ये नहीं है कि इन हत्याओं के पीछे कौन था, सवाल ये भी है कि क्या बांग्लादेश में अब हिंदू होना सुरक्षित नहीं है. अगर ऐसा है तो इसकी ज़िम्मेदारी किसकी है- उन्मादी भीड़, सिस्टम या मुहम्मद यूनुस सरकार?
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