
लेबर कोड बदल देगा कारखानों की सूरत!
भारत में कामकाजी दुनिया एक बड़े बदलाव के मुहाने पर है। दफ्तरों से लेकर फैक्ट्रियों तक हर कर्मचारी और नियोक्ता के मन में एक ही सवाल है कि क्या अब 12 घंटे की शिफ्ट आम हो जाएगी? क्या वेतन और पात्रताएं समान रहेंगी या उनमें कटौती का खतरा है? दरअसल, 2026 से पूरी तरह लागू होने जा रहे नए लेबर कोड को लेकर भी यही आशंकाएं और उम्मीदें एक साथ चल रही हैं।
करीब पांच साल के इंतजार के बाद केंद्र सरकार ने चारों लेबर कोड के नियमों को लागू करने की तैयारी कर ली है. ये कोड 29 पुराने श्रम कानूनों को समेकित करके एक नया ढांचा तैयार करते हैं, जिसके बारे में उनका दावा है कि यह वर्तमान आर्थिक और औद्योगिक जरूरतों के अनुरूप है। सरकार का कहना है कि इससे श्रमिकों को न्यूनतम वेतन की कानूनी गारंटी मिलेगी और संगठित और असंगठित दोनों क्षेत्रों के श्रमिकों को सामाजिक सुरक्षा के दायरे में लाया जाएगा.
सरकार का नया फोकस
सरकार के अनुसार, 2025 श्रम सुधारों के लिए एक महत्वपूर्ण मोड़ रहा है। श्रम मंत्री मनसुख मंडाविया ने कहा है कि अब फोकस सिर्फ कानून बनाने पर नहीं बल्कि जमीन पर असर दिखाने पर होगा. इसी कड़ी में 2026 में ईपीएफओ 3.0 पेश करने की योजना है, जिससे पीएफ निकासी, पेंशन निर्धारण और बीमा दावे पहले की तुलना में तेज और आसान हो जाएंगे।
यूनियनों का कड़ा विरोध
लेकिन जहां सरकार और उद्योग इसे ऐतिहासिक सुधार बता रहे हैं, वहीं ट्रेड यूनियन इसे मजदूर विरोधी बता रहे हैं. यूनियनों का आरोप है कि नए श्रम कोड के जरिए काम के घंटे बढ़ाने और नियोक्ताओं को अधिक छूट देने की तैयारी है. 12 घंटे की शिफ्ट की चर्चा ने इस डर को और बढ़ा दिया है. यूनियनों का कहना है कि इससे कर्मचारियों पर दबाव बढ़ेगा और नौकरी की सुरक्षा कमजोर होगी. इसके विरोध में फरवरी 2026 में देशव्यापी हड़ताल की भी घोषणा की गई है.
उद्योग की उम्मीदें
दूसरी ओर, उद्योग का तर्क है कि नए कोड से अनुपालन में आसानी होगी, निवेश बढ़ेगा और रोजगार के नए अवसर पैदा होंगे। सीआईआई और एम्प्लॉयर्स फेडरेशन जैसे संगठनों का मानना है कि आधुनिक नियम कार्यस्थल को अधिक पेशेवर और सुरक्षित बनाएंगे, साथ ही सामाजिक सुरक्षा का दायरा भी बढ़ाएंगे।
